परिचय: SYL नहर विवाद का महत्व

सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर विवाद भारत के दो महत्वपूर्ण राज्यों, पंजाब और हरियाणा, के बीच जल बंटवारे का एक लंबे समय से चला आ रहा मुद्दा है। यह SYL नहर विवाद न केवल जल संसाधनों के बंटवारे से संबंधित है, बल्कि यह दोनों राज्यों की कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता को भी प्रभावित करता है। इस लेख में हम इस विवाद के ऐतिहासिक, कानूनी, और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा करेंगे, साथ ही हाल के घटनाक्रमों पर भी प्रकाश डालेंगे।

SYL नहर विवाद की पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक संदर्भ

SYL नहर विवाद की शुरुआत 1966 में हुई, जब पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। 1960 के सिंधु जल संधि के तहत भारत को रावी, ब्यास, और सतलुज नदियों पर नियंत्रण मिला। 1955 में रावी-ब्यास के पानी का बंटवारा पंजाब (7.2 MAF), राजस्थान (8 MAF), और जम्मू-कश्मीर (0.65 MAF) के बीच किया गया। हरियाणा के गठन के बाद, उसे 3.5 MAF पानी आवंटित किया गया, जिसके लिए SYL नहर की योजना बनाई गई।

प्रमुख तिथियां और घटनाएं

  • 1976: केंद्र सरकार ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर पंजाब और हरियाणा को 4.3 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी आवंटित किया।
  • 1981: जल बंटवारे के लिए एक समझौता हुआ, जिसमें हरियाणा को 45.33% और पंजाब को शेष हिस्सा मिला।
  • 1982: SYL नहर का निर्माण पंजाब के कपूरी गांव में शुरू हुआ, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण रुक गया।
  • 1985: राजीव गांधी और अकाली दल के नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें नहर निर्माण की पुष्टि हुई।
  • 2004: पंजाब ने सभी जल समझौतों को रद्द करने वाला कानून पारित किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में असंवैधानिक घोषित किया।

SYL नहर विवाद के प्रमुख मुद्दे

पंजाब की स्थिति

पंजाब का दावा है कि उसके पास SYL नहर के माध्यम से हरियाणा के साथ पानी साझा करने के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध नहीं है। राज्य में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, और 76.5% ब्लॉक ओवर-एक्सप्लॉइटेड हैं। पंजाब का तर्क है कि पानी का बंटवारा नदी के किनारे वाले राज्यों के पक्ष में होना चाहिए, जो कि रिपेरियन सिद्धांत पर आधारित है। पंजाब ने यह भी मांग की है कि जल उपलब्धता का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।

हरियाणा की मांग

हरियाणा का कहना है कि SYL नहर के पूरा न होने के कारण उसे उसका हक़ का 3.5 MAF पानी नहीं मिल रहा, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिणी हरियाणा में सिंचाई और पेयजल की गंभीर कमी है। भूजल स्तर 1,700 फीट तक नीचे चला गया है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है। हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में कई बार याचिका दायर की है, जिसमें पंजाब को नहर निर्माण पूरा करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

कानूनी और राजनीतिक गतिरोध

  • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट ने कई बार पंजाब को SYL नहर के निर्माण को पूरा करने का आदेश दिया है, लेकिन पंजाब ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया। 2016 में, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के 2004 के कानून को असंवैधानिक घोषित किया।
  • राजनीतिक तनाव: यह मुद्दा दोनों राज्यों में राजनीतिकरण का विषय बन गया है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और आप जैसे दल नहर निर्माण का विरोध करते हैं, जबकि हरियाणा में इसे किसानों का अधिकार बताया जाता है।

हाल के घटनाक्रम

2025 में ताज़ा विवाद

  • अप्रैल 2025: हरियाणा ने भाखड़ा बांध से अपनी जल आपूर्ति में कमी की शिकायत की और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) से 4,000 क्यूसेक से 8,500 क्यूसेक पानी की मांग की। BBMB ने 4,500 क्यूसेक अतिरिक्त पानी आठ दिनों के लिए मंजूर किया।
  • अगस्त 2025: केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की अध्यक्षता में पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों, भगवंत मान और नायब सिंह सैनी, के बीच दिल्ली में एक बैठक हुई। दोनों पक्षों ने सकारात्मक माहौल में चर्चा की, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।

सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव

SYL नहर विवाद के कारण दोनों राज्यों में सामाजिक तनाव बढ़ा है। हरियाणा के कैथल, जींद, हिसार, फतेहाबाद, और सिरसा जैसे जिलों में सिंचाई की कमी के कारण 3 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि बंजर हो रही है। दूसरी ओर, पंजाब में भूजल संकट गहराता जा रहा है, क्योंकि 79% क्षेत्रों में पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है। पर्यावरणीय रूप से, मानसून के पानी का अप्रयुक्त हिस्सा पाकिस्तान की ओर बह जाता है, और दोनों राज्यों में अत्यधिक भूजल निकासी से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।

समाधान के लिए सुझाव

वैकल्पिक उपाय

  • जल संरक्षण: दोनों राज्यों को जल संरक्षण तकनीकों, जैसे ड्रिप इरिगेशन और रेनवाटर हार्वेस्टिंग, को बढ़ावा देना चाहिए।
  • फसल विविधीकरण: पंजाब में धान और गेहूं जैसे जल-गहन फसलों के बजाय कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहित करना।
  • संस्थागत सुधार: भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड में रिक्तियों को भरना और वैज्ञानिक जल प्रबंधन को लागू करना।
  • अंतर-राज्यीय संवाद: केंद्र सरकार को दोनों राज्यों के बीच निरंतर और पारदर्शी संवाद को बढ़ावा देना चाहिए।

भविष्य की दिशा

SYL नहर विवाद का समाधान तभी संभव है जब दोनों राज्य सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाएं। केंद्र सरकार को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिए और जल उपलब्धता का नवीनतम वैज्ञानिक मूल्यांकन करवाना चाहिए। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीतियों को लागू करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

SYL नहर विवाद पंजाब और हरियाणा के बीच एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है, जो न केवल जल बंटवारे से संबंधित है, बल्कि यह दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था, कृषि, और सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों, राजनीतिक इच्छाशक्ति, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से इस विवाद का समाधान संभव है। दोनों राज्यों को अपने-अपने हितों को संतुलित करते हुए एक स्थायी समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।